Tuesday, August 15, 2006

[ग़ज़ल] उसके ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुज़री तमाम रात


  1. उसके ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुज़री तमाम रात
    या'नी कि इज़्तराब में गुज़री तमाम रात

  2. दिन भर हमें सताती रही फ़िक्र-ए-रोज़गार
    और 'इश्क़ के 'अज़ाब में गुज़री तमाम रात

  3. किस किस ने कौन कौन सा ग़म किस तरह दिया
    अपनी इसी हिसाब में गुज़री तमाम रात

  4. ज़िन्दान-ए-रोज़-ओ-शब से रिहाई किसे नसीब
    इस ख़ानः-ए-ख़राब में गुज़री तमाम रात

  5. साक़ी की इक निगाह ने सर्मस्त यूँ किया
    जैसे मेरी शराब में गुज़री तमाम रात

  6. फिर ज़ुल्फ़-ए-ताबदार का उसकी हुआ है ज़िक्र
    फिर अपनी पेच-ओ-ताब में गुज़री तमाम रात

  7. जब भी सुनाने बैठे उसे दास्तान-ए-शौक़
    बस हसरतों के बाब में गुज़री तमाम रात

  8. "ख़ुरशीद" शब भर उससे न कह पाए हाल-ए-दिल
    लफ़्ज़ों के इन्तिख़ाब में गुज़री तमाम रात

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