Friday, September 06, 2002

[ग़ज़ल] क़फ़स में चैन मिला है न आशियाने में

  1. क़फ़स में चैन मिला है न आशियाने में
    तमाम 'उम्र भटकते रहे ज़माने में

  2. मुहब्बतों का सिला ये मिला ज़माने में --
    हँसी उड़ाई गई अपनी हर फ़साने में!

  3. बस इक चिराग़ की ख़ातिर जिसे जलाया था
    वो आग फैल गई सारे आशियाने में

  4. तिरे ख़याल में वो वक़्त और भी गुज़रा,
    जो वक़्त हमने गुज़ारा तुझे भुलाने में

  5. ख़िज़ाँ से आख़िरी पत्ते ने गिरते-गिरते कहा,
    "अब और देर नहीं है बहार आने में"!!!

  6. गई वो शब, के जब उतरा था चाँद आँगन में
    मगर है रौशनी अब तक ग़रीबख़ाने में!

  7. अभी भरा था ख़ुशी ने इसे ज़रा-सा, के बस
    ग़मों ने लूट मचा दी मिरे ख़ज़ाने में

  8. ग़ज़ब हैं उनकी निगाहों के तीर भी, 'ख़ुरशीद!'
    चलें जिधर को भी, आता है दिल निशाने में

उसी दौरान, के जब मन्दरजा-बाला ग़ज़ल हो रही थी, चन्द और शे'र भी हुए थे. मज़कूरा अश'आर इस ग़ज़ल के तो नहीं हैं, लेकिन इसी बह्र-ओ-ज़मीन में हैं. लगे हाथों उन्हें भी सुनाता चलूँ? :) -- आप चाहें तो इसे एक ग़ज़ल-ए-बेमतला तसव्वुर कर लें --
    'अर्ज़ है:
  1. हँसी हँसी ही में हमको रुला दिया, साहिब
    कुछ एहतियात बरतना था गुदगुदाने में!

  2. मिरी दु'आ के हर इक शब "मिलन की रात" बने
    तुम्हें ये ज़िद्द के कटे रूठने-मनाने में!

  3. ज़रा भी बनने-सँवरने से जब मिली फ़ुरसत
    तो वक़्त ज़ा'या किया हमको आज़माने में! :)

  4. सँभल के रहियेगा, "ख़ुरशीद", नाज़वालों से --
    कहीं कमर न लचक जाए नाज़ उठाने में!!! ;-) LOL

    [ये मक़्ता'अ ख़ास उन लोगों के लिये है जो "lower back pain" की वजह से अकसर परेशान-परेशान से रहते हैं! हा हा हा :)]

Labels:

0 Comments:

Post a Comment

<< Home